अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अगणित दिये जले

   



 


गाँव गाँव में, गली गली में
अगणित दिये जले
मगर अँधेरा बचा हुआ है
अब भी दीप तले

हर सन्ध्या
सबके चौखट पर यद्यपि दिया जलाती
जगह स्नेह की केवल छल है बस बातों की बाती
घोंपा खंजर यहाँ उसी ने
जिसके लगे गले

जिसे खून से
हमने सींचा पाला देकर जीवन
बनकर साँप आज डसता है वही हमारा उपवन
प्रश्न यही है इस बबूल में
कैसे आम फले

आम आदमी
के सपनों का अजब हश्र होता है
न्याय कटघरे में आकर खुद सिसक सिसक रोता है
नैतिकता मुट्ठी में आकर
बार बार फिसले

– रवि शंकर मिश्र रवि
२८ अक्तूबर २०१३

   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter