अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

ये कैसी उजियारी

   



 

ये कैसी रफ्तार जहाँ की
ये कैसी उजियारी है

घात लगाए
बैठे हैं सब, क्या पहरी क्या चोर यहाँ,
न्याय पे हावी है मुंसिफ व, क़ातिल के गठजोड़ यहाँ
गाँव शहर में एक तरह सी
फैल रही अँधियारी है

अपनेपन की
छाँव कहाँ है रिश्तों की अँगनाई में
रीत गए अहसास हमारे किश्तों की भरपाई में
ओछे अपने सपने सारे ओछी
दुनियादारी है

ख़ुदगर्जी की
चील वतन के ख्वाबों पर मँडराती है
जहाँ देखिए लूट, हवस की बाली ही बलखाती है
घर, सरहद महफूज नहीं तो
लानत ये सरदारी है

-शंभुशरण मंडल

२८ अक्तूबर २०१३

   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter