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दीपक इक बाल दें

   



 

उसकन सी
इस गाढ़ी रात में
आओ हम
दीपक इक बाल दें

मौसम का मूड
भाँपना कठिन
उतर-उतर चढ़ जाता 'मूर' है
महुए के कोओं की
टकटकी
हरसिंगार! अभी भोर दूर है
तब तक इस मन को
बहलाने के
बहकावे-
उलझे सवाल दें

दीवारों
पर्दों में चुने-नुचे पंख
रिंगटोन चिड़ियों की चहचहाट
चश्मे के भीतर भी
आँख किरकिराती है
चाय-पान,दिन भर का जी उचाट
आवश्यक अब
नई हवाओं को
परिचय का
बातूनी जाल दें

घर के हर इक
उदास कोने को
आओ हम फिर उजास आँगन दें
वेटिंग में
खड़े-थके सपनों को
पल भर मुस्कान भरा जीवन दें
बेहतर है
बीते कल की पेंडिंग
हम अब
आते कल पर टाल दें

- शुभम् श्रीवास्तव ओम
१५ अक्तूबर २०१६
   

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