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       प्रकाश आतिश का


तिनका एक फुलझड़ी का
चमत्कार करता आया

चिनगारी की वर्षा से
जन जन की झोली भर जाता
बाहें फैलाकर दिल की
हर उलझन को सुलझाता
दर्शाता है, क्षण भर में
जीवन जीने की माया

अंधेरा गुर्राता था
दिल उचाट करते नारे
कृष्ण पक्ष के नेतागण
चिल्लाते मारे मारे
फैला दी खुशियाँ ऐसी
दुख मातम को धमकाया

निहारिका से निकला था
आह्लादित होकर तारा
कण कण आलोकित जिसमें
तणखो की बहती धारा
पीछे मुड़ कर ना देखा
कैसे उपजी थी काया

तड़तड़ हो ना सोचे फिर
कहाँ गिरूँगा मैं नीचे
प्रफुल्लता ने नाप लिए
ज्योति शिखर ऊँचे ऊँचे
किरणे फैलाता जग में
प्रकाश आतिश का भाया

- हरिहर झा
१ अक्टूबर २०२२

       

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