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        एक दिया मुँडेर पर
 
यहीं कहीं हैं
सच्ची खुशियाँ लाओ उनको जरा टेर कर
जिस आँगन में दिखे अँधेरा एक दिया
धर दो मुँडेर पर

गोबर से घर
लिपा पुती हैं गेरू कलई से दीवारें
मुन्ना मुन्नी के हाथों में थमी हुई लकड़ी की कारें
बुधिया के घर भी पूजा है फूल खिले हैं
कुछ कनेर पर

चारों ओर दमकती
बिजली झिलमिल चमक रहीं हैं झालर
महलों के कोने-कोने में पसरी उजियारे की चादर
लक्ष्मी जी तो मेहरबान हैं शीशमहल के
धन कुबेर पर

जमींदार की
भरी तिजोरी अन्न संग्रहित गोदामों में
मना रहे हैं रोज दिवाली जाने कितने आयामों में
एक हाथ में उनके तीतर नजरें हैं
फिर भी बटेर पर

- बसंत कुमार शर्मा
१ नवंबर २०२६

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