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        सिर पर है त्योहार
 
इंद्रदेव मत
घूर निहारो मेरी सरसो लगी नहीं है
मौसम की मारी है मिट्टी घास-पात से
पगी हुई है

अभी बरस पिछले तुमने विनती मेरी न मानी
घूम घिरे घनघोर घने घन कर दी कारस्तानी
बेमौसम आने की आदत बेजा हरकत
रुकी नहीं है

सिर पर है
त्योहार गली में चुटपुटिया की आहट
ग्यारह दिया जलाऊँ देहरी किलके मन में चाहत
न कुम्हार न दीपक बाती आँख तुम्हीं पे
टिकी हुई है

एक दिया
सरसों में निकले नौ मन तेल खली भी
उतने में तो घर जगमग हो बगिया द्वार गली भी
दे दे साथ अरे ओ दाता आस अभी भी
उगी हुई है

- जिज्ञासा सिंह
१ नवंबर २०२६

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