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        एक दीप से जले दूसरा
 
अंधकार बढ़ता जाता है
दीपक का पर
तेज घटे

संस्कार रावण के भारी
सहना देश की है लाचारी
उसकी पूछ-परख है इतनी
उसे जिताने
सभी डटे

दीवाली बिन दीप पटाके
होली भी है रंग हटाके
आँगन जैसी इस धरती पर
कदम कदम पर
अटे पटे

एक दीप से जले दूसरा
यह प्रयास भी नहीं रहा खरा
कोई ऐसी नीति बनाएँ
पाप कटे
संताप हटे

- लक्ष्मीनारायण गुप्ता
१ नवंबर २०२६

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