अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

        रात भर जलता दिया
 
रात भर जलता
रहा दीपक, किसने उसका मान बढ़ाया?

आँगन में अब
धूप नहीं है, दीवारों पर छाँव खड़ी है।
रिश्तों की चौखट पर जैसे, चुप्पी की जंजीर पड़ी है।
टिमटिम करके भी उसने, अँधियारे को
मार्ग दिखाया।

बाजारों में दीप
सजे हैं, बिकते सपने रंग-बिरंगे।
महलों में उत्सव की धूम है, झोपड़ियों के भाग्य बेरंगे।
सच की लौ को ढँकने वालों, किसने
अंधियारा फैलाया?

झंझा उठी, निशा
घिर आई, लौ ने फिर भी राह दिखाई।
बूढ़ी आँखों की पलकों पर, एक नई उम्मीद जगाई।
जलते रहना, राह दिखाना, उसने अपना
धर्म निभाया।

कब तक सूरज
राह दिखाए, कब तक चाँद करे रखवाली।
अपनी लौ से राह बनाएँ, रात भले हो कितनी काली।
एक तरफ रोशनी के मेले, एक तरफ
सूना गलियारा।

- महेन्द्र तिवारी
१ नवंबर २०२६

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है