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        मृण्मय दीप जलाएँ
 
अनगिन दीप बनाये जिसने उसके घर अँधियार घने
घीसू बैठा सोच रहा है कैसे ये
त्योहार मने

बिजली की झालर
एल.ई. डी. धंधा चौपट कर डाला
सोच दिखावे वाली आई पर्व हुआ एकदम काला
उन्मन मुख पर मलें उजाले दीपोत्सव को पूर्ण करें
गहन तमस की रात अमावस आओ मृणमय दीप जलायें
फूल सुगंधित सजा रंगोली आज धरा को सभी सजायें
बाँट खुशी का बढ़े खजाना ऐसे
ना तुम रहो तने

मर्यादा पुरुषोत्तम
जिनका विजय पर्व तुम मना रहे
आदर्शों का भान नहीं तुम अपनी ढफली बजा रहे
केवल राम नाम जपने से बात कोई भी नहीं बने
आज अभी प्रण लेकर तुम मिट्टी के दीये ले आओ
प्रेम भाव की बाती पूरो कुछ मुख हर्षित कर जाओ
सही अर्थ में होगी पूजा
लक्ष्मी दें आशीष घने

- रश्मि कुलश्रेष्ठ
१ नवंबर २०२६

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