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माटी के दीये |
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अम्मा की कुटिया के
प्यारे,सारे माटी के दीपक
पुचकारा करती हैं लेकर
अपने हाथों में अब तक
नाजों से पाला बाबा ने, हाथों
से थपकी देकर
रूप रंग है लगे सुहाना, लाया
है खुशियां लेकर
अपने संगी साथी के संग
चले शहर वो पलक झपक
सूनी है कुटिया बाबा की,
अम्मा लेटी है खटिया पर
कैसे होंगे? ना जाने वो, हाथ
चले सिल बटिया पर
गली गली वो भटक रहे हैं
सूख गए उनके हलक
जगमग जगमग लड़ियां करती,सारे
शहरों पर कब्ज़ा
लुढ़क रहे ढेरों में
रहकर,नहीं रहा दिल में जज़्बा
लाचारी ने दिखा दिया है
नाउम्मीदों का फ़लक
- रश्मि सिंह
१ नवंबर २०२६ |
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