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सूर्य देवता जाड़े में
 
मौसम से घबरा कर सूरज
तुमने क्यों बदली है चाल
घन ओटों से बाहर आओं
द्वार खड़ा है
नूतन साल

सूर्य देवता जाड़े में क्या
तुम भी थर थर काँप रहे।
ओढ़ दुशाला बदली का तुम
मुख अपना भी
ढाँप रहे
बाहर निकलो आकर देखो
जन जीवन का
बुरा है हाल

रुकता नहीं समय का पहिया
बंद पड़े तुम बिन सब काम
बाट जोहते तिल, गुड़, खिचड़ी
तुम अब तक
करते आराम
असमान से धुंध हटाओ
उड़ें पतंगें
भी खुशहाल

गमन कर रहे उत्तर में अब
ताब दिखा दो तुम आफताब
धूम धाम से स्वागत करने
पोंगल, लोहड़ी
बिहू बेताब
धरा प्रतीक्षित लगी सँवरने
ले बसंत का
रंगीं थाल

- सीमा हरि शर्मा
१२ जनवरी २०१५

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