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१२. ५. २००८ 

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शेखर पॉल की रचना

आधी सोई आधी जागी

बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका बासन
चिमटा फुँकनी जैसी माँ

बान की खुर्री खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दुपहरी जैसी माँ

चिड़ियों की चहकार में गूँजे
राधा-मोहन अली-अली
मुर्गे की आवाज़ से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ

बीवी बेटी बहन पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिनभर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ

बाँट के अपना चेहरा माथा
आँखें जाने कहाँ गईं
फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ

- निदा  फ़ज़ली

इस सप्ताह

मातृ दिवस के उपलक्ष्य में माँ को समर्पित नई पुरानी कविताओं का संकलन

छंदमुक्त में-

नई हवा में-

पाठकनामा में-

दिशांतर में-

पिछले सप्ताह
५ मई २००८ के अंक में

छंदमुक्त में-
सुषम बेदी

पुनर्पाठ में-
डॉ. किशोर काबरा

दिशांतर में-
रचना श्रीवास्तव

अंजुमन में-
नीरज गोस्वामी

कुंडलियों में-
मदन मोहन शर्मा

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प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
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