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अनुभूति में आदिल रशीद की रचनाएँ-

अंजुमन में—
गिर के उठकर
तुम्हारे ताज में
न दौलत जिंदा रहती है
पहले सच्चे का बहिष्कार

 

तुम्हारे ताज में

तुम्हारे ताज में पत्थर जड़े हैं
जो गोहर हैं वो ठोकर में पड़े हैं

उडाने ख़त्म कर के लौट आओ
अभी तक बाग़ में झूले पड़े हैं

मेरी मंजिल नदी के उस तरफ है
मुक़द्दर में मगर कच्चे घड़े हैं

ज़मीं रो रो के सब से पूछती है
ये बादल किस लिए रूठे पड़े हैं

किसी ने यूँ ही वादा कर लिया था
झुकाए सर अभी तक हम खड़े हैं

महल ख्वाबों का टूटा है कोई क्या
यहाँ कुछ काँच के टुकड़े पड़े हैं

उसे तो याद हैं सब अपने वादे
हमीं हैं जो उसे भूले पड़े हैं

ये साँसे, नींद, और ज़ालिम ज़माना
बिछड़ के तुम से किस किस से लड़े हैं

मैं पागल हूँ जो उनको टोकता हूँ
मेरे अहबाब तो चिकने घड़े हैं

तुम अपना हाल किस से कह रहे हो
तुम्हारी अक्ल पर पत्थर पड़े हैं

११ अक्तूबर २०१०

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