अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल की रचनाएँ -

नई रचनाओं में-
सात मुक्तक

अंजुमन में-
आस का रंग
कल का युग
कालिख जो कोई
चैन के पल
टूट जाने पर
पिघलकर पर्वतों से
मन कभी घर में रहा
हर नया मौसम

 

पिघलकर पर्वतों से

पिघलकर पर्वतों से हमने ढल जाना नहीं सीखा
न सीखा बर्फ बनकर हमने गल जाना, नहीं सीखा

वो राही, तुम ही सोचो किस तरह पहुँचेगा मंज़िल पर
वो जिसने ठोकरें खाकर सँभल जाना नहीं सीखा

हमें आता नहीं है मोम के आकार का बनना
ज़रा-सी आँच में हमने पिघल जाना नहीं सीखा

बदलते हैं, मगर यह देखकर कितना बदलना है
हवाओं की तरह हमने बदल जाना नहीं सीखा

सफर में हर कदम हम काफिले के साथ हैं, हमने
सभी को छोडक़र आगे निकल जाना नहीं सीखा

३ अक्तूबर २०११

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter