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अनुभूति में मदनमोहन शर्मा अरविंद की रचनाएँ

अंजुमन में—
पत्थरों को आइना कैसे कहूँ
पतझड़ को न देना तूल
बड़ी बेजोड़ ये सौग़ात होती
भूख का मतलब
वक्त ने दो ग़म दिए

 

पतझड़ को न देना तूल

और पतझड़ को न देना तूल फिर से,
मुसकुराएँगे चमन में फूल फिर से।

तुम न उपवन से अभी बाहर निकलना,
राह रोकेंगे उलझ कर फूल फिर से।

प्यास अब तक और शायद बढ़ गई है,
राह में उड़ने लगी है धूल फिर से।

आस के बादल भला कैसे बरसते,
बिजलियों में हो गए मशगूल फिर से।

कल हवन करते हथेली जल गई थी,
हो न जाए आज कोई भूल फिर से।

ठीक से चेहरे नज़र आते नहीं हैं,
साफ़ कर दो आइनों की धूल फिर से।

1 जुलाई 2007

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