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गोपाल कृष्ण 'आकुल'

जन्म - १८ जून १९५५, महापुरा, जयपुर, राजस्थान में।
शिक्षा- एम. कॉम., डी.टी.पी. (कंप्यूटर)

कार्यक्षेत्र- १९७५ से अनेक समसामयिक पत्र पत्रिकाओं में बाल पहेलियाँ, कहानी, लघु कथाएँ, कविताएँ, नाटक, लेख आदि प्रकाशित। १९९३ से उत्तर प्रदेश के प्रमुख समाचार पत्रों ‘अमर उजाला’, ‘अकिंचन भारत’ में, मध्य-प्रदेश के ‘नवभारत’ एवं अंग्रेजी सांध्य दैनिक ‘क्रोनिकल’ में अंग्रेजी में २००८ तक जुड़ाव और दैनिक वर्ग पहेली प्रकाशन। अब तक लगभग ६००० हिंदी वर्ग पहेली एवं ४०० अंग्रेजी वर्ग पहेलियाँ प्रकाशित। फ्रेंड्स हेल्प लाइन, कोटा की मित्र पत्रिका ‘कृतज्ञ यज्ञ सकंल्पट’ में २००१ से प्रधान सम्पादक, जनवादी लेखक संघ, कोटा में शहर इकाई अध्यक्ष एवं जिला इकाई में उपाध्यक्ष।

प्रकाशित कृतियाँ-
नाटक- प्रतिज्ञा, हिंदी ग़ज़ल और नज्म संग्रह- पत्थहरों का शहर और कविता संग्रह- जीवन की गूँज। ९ पुस्तकों का संपादन।

सम्प्राति-
राजकीय सेवा- इंजीनियरिंग कॉलेज, कोटा जो क्रमोन्न त हो कर अब राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय, कोटा (राजस्थान) है, में १९८८ से स्थाई सेवा में। वर्तमान में वरिष्ठ लिपिक के पद पर।

ब्लॉग
सान्निध्य’ एवं ‘सान्निध्य स्रोत’ में निरंतर लिखना।

संकलन में-
देश हमारा- उन्नत भाल हिमालय

ईमेल- aakulgkb@gmail.com 

 

झोंपड़ पट्टी

महामारी की तरह फैले
झोंपड़ियों के मेले
हर शहर में इधर-उधर
जहाँ-तहाँ मैल कुचैले
दिन दूनी, रात चौगुनी
बढ़ती रेलम पेलें
पैबंद सरीखे यहाँ
बढ़ रहे हैं इनके झमेले
एक नई संस्कृति पनप रही है
वोटों की राजनीति बन रही है
इनको नहीं च्युतत किया जा सकता
इनको नहीं कोई उपदेश दिया जा सकता
मानवाधिकार बीच में आएगा
कानून गोते खाएगा
नेताओं की सरगर्मियाँ बढ़ेंगी
विकास रुकेंगे, पर
इनके अधिकार कम नहीं होंगे
सरकारी तंत्र परेशान है
आम जनता हैरान है
कहीं भूमाफि‍या अतिक्रमण करते हैं
कहीं ये लोग अतिक्रमण करते हैं
ये भले ही कुपोषित हों
बड़े घरों के द्वार
इनके लिए खुले हैं, इसीलिए
इनमें बेकारी की समस्या नगण्य है
पर इनका जलकुंभी की तरह
पनपते रहना जघन्य है
आँकड़ों में बढ़ते जा रहे हैं ये लोग
आँकड़ों से ही चलाते हैं ये
बिजली पानी उद्योग
देख कर भी बंद हैं आँखें प्रशासन की
कोई नहीं करता दुस्साहस इस दु:शासन की
पर्यावरण की बातें बेमानी
संक्रमण, अतिक्रमण इनकी कहानी
गंदगी में उड़ती हैं दावतें
स्वाइन फ्लू, डेंगू, चिकनगुनिया की
इनसे हैं अदावतें
परेशान ये नहीं, आम आदमी है
इनको शिक्षित करे
नहीं कोई अकादमी है
हर शहर इक धारावी को जनमेगा
हर शहर इन्हें मिला कर मेट्रो बनेगा
चेचक की तरह इनका
उन्मूलन जरूरी है
स्वाइन फ्लू की तरह
विस्फोट की उम्मीद पूरी है
इनकी देशव्यापी यूनियन
इक नई जेहाद छेड़ेगी
राज्य में इनके
वोटिंग पोटेंशियल की बात छेड़ेगी
हर ओर से अलग राज्य का
जन निनाद उठेगा
संसद में नया बिल पेश होगा
अंतत: झारखंड और उत्तराखंड की तरह
झोंपड़खंड भी एक राज्य होगा
गंदगी का यहाँ साम्राज्य होगा
हर राष्ट्र प्रमुख यहाँ आएगा तो
विशेष सम्मानित होगा
असली राम राज्य यहाँ पनपेगा
यहाँ किसी के घर में
ताले नहीं लगेंगे
कबाड़ यहाँ का उद्योग होगा
खिचड़ी यहाँ का राजभोग होगा
फटे पुराने कपड़े जूते यहाँ की
राजपोशाक होगी
कुपोषित खिचड़ी दाढ़ी यहाँ की
पहचान होगी
परिश्रमी हैं इसलिए
विदेश में नौकरी के लिए प्रतिबंध नहीं होगा
यहाँ यदि प्रतिबंधित होगी तो
पढ़ाई और सफाई
अन्य राज्यों, देशों से कचरा कबाड़ा
मुफ्त में आयातित होगा
कचरे-कबाड़े से अगर बने
स्वावलम्बी तो
पनप सकेते हैं कितने ही उद्योग
माल की कमी से प्रभावित
हो सकते हैं अन्य उद्योग
धीरे धीरे बढ़ती इनकी शक्ति से
पड़ौसी राज्य में गाँवों, शहरों को
कबाड़े में बदलने को
पनपेंगी आतंकवादी ताकतें
होंगे आतंकवादी हमले
फि‍र निनाद उठेगा
बिल संसद तक पहुँचेगा
फि‍र संविधान में संशोधन होगा
चर्चा और समाशोधन होगा
बँटवारा होगा और अतंत:
और एक नया राष्ट्र पनपेगा
विश्व मानचित्र पर- झोंपड़ पट्टी

सभी राष्ट्र मान्यता देने को
आगे आयेंगे
कचरा और झोंपड़पट्टी
हर देश की समस्या है
गले लगाएँगे
इस समस्या में सर्वोपरि
एशिया है अग्रणी कहलायेंगे
सभी देशों को इस समस्या से
राहत दिलाने
शांति और पर्यावरण के क्षेत्र में
विशिष्ट कार्य करने के लिए
कदाचित शांति का नोबेल मिल जाये
देश को महाशक्ति बनने का
रास्ता मिल जाये
महामारी से जनसंख्या और
संस्कृतियाँ मिट जाती थीं
उठ कर फि‍र सँभलने में
सदियाँ निकल जाती थीं
कोई राज्य या देश
इस तरह के आवासन से ग्रसित
अमूमन होगा
कदाचित एक नये राष्ट्र् बनने से
इस बीमारी और समस्या का
उन्मूमलन होगा।

२९ नवंबर २०१०

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