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अनुभूति में सचिन श्रीवास्तव की रचनाएँ—

छंदमुक्त में—
इस समय- चार कविताएँ
कसैली संभावना
तकरीबन आख़िरी
नीयत तुम्हारी नियति हमारी
मकान जो कहीं नहीं है
माफी
लफ़्ज़
सच से बड़ी उम्मीद

 


 

  इस समय- चार कविताएँ

इस समय-१: सुविधाजनक

हम सेंधमारी की सुविधा में
जिंदगी के मजे बचा ले जाते थे
हमें उत्तर को दक्षिण
या पूरब को पश्चिम करने की जल्दी नहीं थी
इसके लिए सही वक्त का आलसी इंतजार करना था
तीखी और सीधी लडाई में खेत होने का वक्त नहीं था हमारा
हमें तो सेंधमारी करनी थी
और हम दिन में सांस ले रहे थे
बहुत वक्त था अभी हमले में
सुस्ताया जा सकता था
गीत गाये जा सकते थे
खूबसूरत आँखों के
चुटकुलों को हवा दी जा सकती थी
और दोस्त की कलाई पकडकर दिखाई जा सकती थी ताकत
दुश्मन के हमले की तैयारी दिन के उजाले में भी दिख रही थी
इससे बेखबर
हम सेंधमारी की सुविधा में
जिंदगी के मजे ले रहे थे

इस समय-२ : गौरव

पैदाइश में मिले देश, भाषा, धर्म और इतिहास पर
गर्व करने की कोई वजह नहीं थी
हमारे पास
जिये गए समय में कोई काम नहीं था
हमारे पास
जिस पर सीना फुलाया जा सके
दिनों पर रेंगती सिगरेट खाऊ सडकों पर फेंके वक्त के किसी घंटे में
आसमान की उछालने लायक
ताकत नहीं बटोर पाये थे हम
अनगिनत असफलताओं के बीच फिर भी हम
खिलखिला उठते थे
एक खरगोश देखकर
एक फूल सूँघकर
और पानी का छींटा मुँह पर मारकर

इस समय-३ : तयशुदा

हमारे बच्चों को कभी आइडल नहीं बनना था
हमारी प्रेमिकाओं को "ओ गॉड" की रटी-रटायी ध्वनि नहीं निकालनी थी
स्टेज पर
हमारी माँएँ बिना वसीयत किए ही
मर जाने वाली थीं
हमारे भाइयों को कोसना ही था
पूरी दुनिया को एक अदद नौकरी के लिए
पेशेवर अपराधी की तरह बाजार में सजी
फ्लैट स्क्रीन
हमारे घरों की दीवारों का हिस्सा नहीं बननी थी
जीवन की असंख्य अनिश्चितताओं के बीच
कुछ घटनाएँ तय थीं
जीने और मरने के बीच
और सबसे ज्यादा निश्चित एक बात थी
कि हमें खुशियाँ डब्बाबंद नहीं मिलनी थीं
हमारी खुशियाँ हरे आसमान में खुली पडी थीं
कदम कदम पर
जैसे
हँसी, बूँद और
काँच का एक टुकडा

 

इस समय-४ : मिठास

दुश्मन की रोटी कैसी भली लगती है
दिल पर रखे पत्थर को दबाकर
नजरें नीची करके, खून का घूँट पीकर
नहीं ली जाती दुश्मन की रोटी
गर्दन को गिरफ्त में लेकर
बाजुओं की फडकती मछलियों के दम पर
छीनी भी नहीं जाती
दुश्मन के हाथ से
दुश्मन की रोटी
शातिर मुस्कुराहट के साथ उठा ली जाती है
नक्काशीदार प्लेट से
साथियों का भरोसा
कोढियों में बेचकर
क्या सचमुच
यकीन से भी मीठी होती है
दुश्मन की रोटी!!

१५ मार्च २०१०

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