अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अनुभूति में संजय कुमार की रचनाएँ -
टोपी और जूता
तथाकथित
लाचारी
शोर
हाथ

 

  शोर

खुले दरवाजे से
बाहर का शोर
भीतर आ जाता है

बंद दरवाजे से
अपने भीतर का शोर
बाहर आ जाता है

आखिर कोई
किस तरह बचे ?


टोपी और जूता

पहले लोग
टोपी उछाल कर ही
खुश हो लेते थे
आज
जूते बरसा कर भी
नाराज रहते हैं ।

तथाकथित

पढ़ लिख कर
हम होशियार बनते हैं

होशियार बन कर
सीख जाते हैं
बंटना और बांटना

फिर बङी होशियारी स
ेकहते हैं
हम एक हैं ।

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter