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अनुभूति में डॉ. शिवदेव मन्हास  की रचनाएँ -

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चुप्पी में जादू
प्रेम केवल खामोशी
ये मेरी उँगलियाँ

 

ये मेरी उँगलियाँ

ये मेरी उँगलियाँ
जो तुम्हारे गेसुओं को छू के आई हैं
इनमें कुछ सुगंध-सी है
जिसे सिर्फ़ मैं ही
महसूस कर सकता हूँ।
यह मेरी उँगलियाँ
जो तुम्हारे होठों को छू के आई हैं,
इनमें कुछ कंपन-सी है
जिसे सिर्फ़ मैं ही
महसूस कर सकता हूँ।
यह मेरी उँगलियाँ
जो तुम्हारे जिस्म को छू के आई हैं
इनमें कुछ हरारत-सी है
जिसे सिर्फ़ मैं ही
महसूस कर सकता हूँ।
पर
मेरा यह अहसास अभी अधूरा है।
काश!
मैं हवा बन जाऊँ।
और तुम्हें भीतर से छू पाऊँ।
इन दिनों मैं हवा से
साँसें बनने की कला सीख रहा हूँ।
इंशा अल्लाह!
अगली बार
मैं तुम्हें
तुम्हारे दिल में मिलूँगा।

1 फरवरी 2007

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