अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में सुमन केशरी की रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
औरत
बा
बा और बापू
महारण्य में सीता
लोहे के पुतले

 

महारण्य में सीता

माँ इस महारण्य में
जहाँ दुःख, लज्जा और क्रोध से संतप्त मन
और गर्भ में आकार लेते
शिशुओं के अलावा कोई और साथ नहीं
तुम याद आती हो
तुम्हे
जिसे भुला दिया है सभी ने
इन सारे समयों में
हाशिए पर भी कहीं मौजूद नहीं तुम
क्यों कि जननी नहीं तुम
नहीं सींचा खुन से तुमने मुझे

पुत्र नहीं मैं
रचे नहीं गए
मेरी क्रीड़ाओं के गान
मेरा
शिव धनुष से खेलना
बस एक अनहोनी घटना भर थी
पिता के मन में उम्मीद जगाती
श्रेष्ठ दामाता की
पिता द्वारा स्वयंबर की घोषणा पर
पलक की कोर में आँसू छिपाती
तुम्हारी वह छवि..
ससुराल भेजते समय
एक अनजाने भय से कंपित
तुम्हारी मुस्कान
हर पल अपने आँचल में
मुझे छुपा लेने की तुम्हारी चाह...

कहते हैं माँ का मन आइना होता है
दाने क्या तो देख लिया था माँ तुमने...

मेरी इस अवस्था में
तुम्हारी स्मृतियाँ ही तो संबल हैं माँ...

सौन्दर्य और पीड़ा से परिभाषित इस जीवन में
माँ, अब जब कोई यहाँ साथ नहीं
तुम याद आती हो पृथ्वी सी
जिस पर कदम रख हम खड़े होते हैं
मानो खड़े हों अपने दम पर....

२१ मई २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter