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अनुभूति में विजय सिंह की रचनाएँ

छंद मुक्त में-
डोकरी फूलो
पक रहा है जंगल
बेटे की हँसी में
शांत जंगल को
हँस रहा हूँ मैं

 

 

शांत जंगल को

पगडंडी को छूकर
एक नदी
बहती है मेरी भीतर
हरे रंग को छूकर
मैं वृक्ष होता हूँ
फिर जंगल
मेरी जड़ों में
खेत का पानी है
और चेहरे में
धूसर मिट्टी का ताप
मेरी हँसी में
जंगल की चमक है ।
गाँव की अधकच्ची पीली मिट्टी से
लिखा गया है मेरा नाम
मैं जहाँ रहता हूँ
उस मिट्टी को छूता हूँ
मेरे पास गाँव है, पहाड़, पगडंडी
और नदी-नाले
और यहाँ बसने वाले असंख्य जन
इनके जीवन से
रचता है मेरा संसार
यहाँ कुछ दिनों से
बह रही है तेज-तेज हवा
कि हवा में
खड़क-खड़ककर चटक रही हैं
सूखी पत्तियाँ

मैं हैरान हूँ
शांत जंगल को
नये रूप में देखकर ।

१५ दिसंबर २००८

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