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सराहना

 

  सराहना

देखा है मैंने
खुले आकाश के,
बाँह पसारे
विस्तार को।
नदिया के रुख को
मचलते खेलते
बहने को।
हर उषा से
आशआ की किरण को
महसूस किया है।
सलाखों के पीछे से
देख सह चुप रह कर
जिया है मैंने
हर दिन
हर पल को
और सराहा है उसे
जिसने मुझे यह सब
देखने दिया
चाहे सलाखों के पीछे से ही।

1 अगस्त 2006

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