अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में मंजु मिश्रा की रचनाएँ-

नई क्षणिकाओं में-
चलो बैठो और सुनो

क्षणिकाओं में-
हताशा और निराशा

संकलन में-
दीप धरो- आठ क्षणिकाएँ
होली है- फागुन आया

होली है- रंग बरसे (हाइकु)

  हताशा और निराशा

१
हताशाएँ और निराशाएँ
तो फिर भी,
झेल लेता है आदमी
जब भी हारता है, तो बस
अपनी अपेक्षाओं से ।

२
मन के भीतर, मन के बाहर
कितने जाले, कौन निकाले
फिर फिर आयें फिर फिर जाएँ
वही अँधेरे वही उजाले।

३
किरकिरी की आड़ लेकर
दुःख के पहाड़ गलाना
और फिर आँचल की कोर से
आँखे पोंछ मुस्करा देना
कोई नया रिवाज़ तो नहीं है ।

४
आशा जीवन को
गति देती है, तो
निराशा दम तोड़ देती है ।

५
रिश्तों को लेन-देन की
बद-नज़र से दूर रख
ये जगह पा जाये तो
रिश्ते तोड़ देती है।

६
ज़िन्दगी यदि ठहर जाये
तो अनूदित मृत्यु है
और जीने के लिए
अविरल भटकना चाहता हूँ

७
साँस साँस बन गयी लुटेरी
हरजाई हर भाव है
मन का मन के आँगन से
मीलों तक अलगाव है।

७ मार्च २०११

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter