अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 


अनुभूति में डॉ परमजीत ओबेरॉय की रचनाएँ-

दो कविताएँ
शरीर घट में

 

  दो कविताएँ

चक्र

वर्षा के दिन देख
सहसा कुछ कीट पतंगें
मन हो जाता है व्यग्र
सोचकर यह कि
हम भी थे कभी उन जैसे
आज हमें है घृणा उनसे
कभी उन्हें भी होती होगी हमसे
जब वे थे मनुष्य।
घृणा का यह चक्र
दिन पति दिन होता जा रहा है
चक्र

समय की आग

धधकती आग
मानव मन में
ईर्ष्या की द्वेष की
भूख की द्नंद्व की।
स्वयं को
अपनी विद्वत्ता श्रेष्ठता
महानता दिखाने की
वास्तव में आग है
पवित्रता दृढ़ता सच्चाई और
उज्ज्वलता का प्रतीक।

24 अप्रैल 2005

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।