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अनुभूति में प्रो. रामनाथ शर्मा की रचनाएँ-

अपने सपने
बसंत को बुलाओ
बाद में हम

 

बाद में हम

मैं अपने-आप में कैद
एक अदना मुसाफ़िर है।
रास्ते की धूप में तपता,
बारिश में भीगता,
जब किसी ठिकाने पहुँच
सुस्ताता है,
अनकही सुनता है, सुनाता है।
अनजाने ही आँख की कोर से
आँसू की एक बूँद उभरती है,
बोलती है, रोना नहीं,
आँसुओं की बाढ़ में पहले
मनोबल टूटता है,
बाद में हम। 

16 मार्च 2007

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