अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में सरदार कल्याण सिंह
के दोहे -

नए दोहे—
शिक्षक दिवस मना रहे

दोहों में--
गणपति बप्पा मोरया

ग्रीष्म पचीसी
चुनावी चालीसा
दोहे हैं कल्याण के
नीति के दोहे
मज़दूर
मूर्ख दिवस

संकलन में—
ममतामयी—माँ के नाम

 

मूर्ख दिवस

करते रहिए फील गुड़ गया चुटकला फैल।
देखो मूर्ख बने कौन, आने दो अप्रैल।

धोखा, झूठ, फरेब से किया हमें हैरान।
बोले मूर्ख दिवस है, करता क्या कल्यान।

बुद्धू मुझे बना दिया, बोले हैं अप्रैल।
मैं बोलूँ तो अर्थ है, मार मुझे आ बैल।

किसी बहाने आपने, किया हमें है याद।
मूर्ख बने तो क्या हुआ, आया मीठा स्वाद।

होली की सद्भावना, मूर्ख दिवस की जान।
महामूर्ख हम भी बनें चाहें सब कल्यान।

करे फर्स्ट अप्रैल को, लोक सभा तकरार।
चाहे भला ग़रीब का, धनियों की सरकार।

पूर्ण वर्ष में एक दिन, कहते हमको फूल।
बाकी के दिन बचें जो, करते भूल कबूल।

मूर्ख दिवस उपनाम दे, बढ़ जाता सम्मान।
बीवी बुद्धू कहे तो, होता खुश कल्यान।

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter