अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

शैलेन्द्र शर्मा

नए दोहे-
रिश्ते

दोहों में-
तप से ही संसार में

 

 

तप से ही संसार मे

कुछ हरियाली फूल कुछ, काँटों का विस्तार
कैक्टस का है बाग़ या, रिश्तों का संसार

दावा करते नेह का, किंतु चुभोते डंक
रिश्तों ने छोड़ा किसे, क्या राजा क्या रंक

रिश्तों के संसार का, यह कैसा दस्तूर
ज्यों-ज्यों बढ़ती दूरियाँ, दिल से होते दूर

जो रिश्ता जितना अधिक, अपने रहा करीब
जड़ी उसी ने पीठ पर, उतनी बड़ी सलीब

रिश्ते रिसते घाव से, बन जाएँ नासूर
उन्हें समय से कीजिए, काट-छाँट कर दूर

उनसे मुँह न चुराइए, करिए कभी न रोष
जिन रिश्तों से आपको मिलता हो परितोष

जिस रिश्तों से जगत में फैले धूप-सुगंध
उन रिश्तों से कीजिए हर पल-छिन अनुबंध।

१ दिसंबर २००८

 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

 सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter