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अनुभूति में सुमित्रानंदन पंत की अन्य कविताएँ

गंगा
तप रे मधुर मधुर मन
द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्
मैं नहीं चाहता चिर सुख
मोह
बाँध दिए क्यों प्राण
पाषाण खंड
जीना अपने ही में
वसंत

संकलन में-
वसंती हवा- वसंत
वर्षा मंगल - पर्वत प्रदेश में पावस
मेरा भारत- १५ अगस्त १९४७
ज्योति पर्व- बाल प्रश्न
तुम्हें नमन- बापू के प्रति

 

जीना अपने ही में

जीना अपने ही में
एक महान कर्म है
जीने का हो सदुपयोग
यह मनुज धर्म है

अपने ही में रहना
एक प्रबुद्ध कला है
जग के हित रहने में
सबका सहज भला है

जग का प्यार मिले
जन्मों के पुण्य चाहिए
जग जीवन को
प्रेम सिन्धु में डूब थाहिए

ज्ञानी बनकर
मत नीरस उपदेश दीजिए
लोक कर्म भव सत्य
प्रथम सत्कर्म कीजिए

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