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अनुभूति में आनंद शर्मा की रचनाएँ—

नए गीतों में-
कुछ तो होना ही था

तम का पीना आसान नहीं होता
यायावर जैसा जीवन जीते हैं
यह अँधेरा तो नया बिलकुल नया है
यह नगर व्यापारियों का है

गीतों में-
गंगाजल वाले कलश
मेरे मन के ताल में

  यह नगर व्यापारियों का है

घूमकर सारा नगर कितना थका
गीत मेरा बोल बस इतना सका-
यह नगर! यह नगर व्यापारियों का है

यंत्रवत-सी ज़िन्दगी की यंत्रणा
रोज़ करती है धुएँ से मंत्रणा
और सबसे प्यार केवल धूप से
आदमी करता यहाँ पर है घृणा

शाम तक का श्रम पसीना आ गया
और यह अहसास मन पर छा गया
यह नगर! यह नगर लाचारियों का है

हर संगठन अलगाव बोने के लिए
दशरथ नमन युवराज होने के लिए
ये संस्थाएँ धर्म या साहित्य की
बस काम आती दाग़ धोने के लिए

एक टूटा स्वप्न आखिर हारकर
भोर में बतला गया मन मारकर-
यह नगर! यह नगर संसारियों का है

ये लोग जैसे लूटकर कुछ भागते
अपराधियों से उम्र भर फिर जागते
क्रूरता आतंक वाली गोलियाँ
असहाय लोगों पर अचानक दागते

थपथपाकर द्वार यह बोली हवा
ऐतिहासिक सत्य मत इसको दबा-
यह नगर! यह नगर तातारियों का है

४ मई २००९

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