अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अनुभूति में कृष्ण मुरारी पहारिया की रचनाएँ-

गीतों में-
एक दिया
कविता पाठ वहीं
मन की धरती पर
मन तुम काजी हो या मुल्ला
मन तुम किसके रूप

 

कविता पाठ वहीं

चिता जहाँ मेरी सजती हो
कविता पाठ वहीं कर लेना
प्राणों को लय पर तैराकर
अच्छी तरह विदा कर देना

अगर सगे सम्बन्धी मेरे
चिता सजा कर रोयें धोयें
उनसे बस इतना कह देना
काँटे अंतिम बार न बोयें
जब तक साँसें रहीं देह में
तब तक की सेवा क्या कम है?
चलते समय आँख गीली क्यों
और पूछना कैसा गम है

वे स्वतंत्र हैं उनकी नैया
उनके हाथ उन्हीं का खेना

तुम पर मेरा, मेरे मित्रों
और नहीं इतना तो ऋण है
सारी रचना तुम्हें समर्पी
जैसे हरी दूब का तृण है
उस तृण की शीतलता पीकर
कभी ह्रदय सहलाया होगा
भटका हुआ पिपासित यह मन
क्षण भर को बहलाया होगा

इतना करना मेरी खातिर
खड़ी रहे छंदों की सेना

१५ अप्रैल २०१६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter