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अनुभूति में महेंद्र भटनागर की रचनाएँ

छंदमुक्त में-
अभिलषित
आसक्ति
गौरैया
पाताल पानी की उपत्यका से

गीतों में-
उत्सर्
एक दिन
जीने के लिए
दीपक
धन्यवाद
बस तुम्हारी याद
भीगी भीगी भारी रात

शुभैषी
सहसा
यह न समझो

कविताओं में-
आस्था
ओ भवितव्य के अश्वों!

  भीगी भीगी भारी रात

भीगी-भीगी भारी रात,
नींद न आती सारी रात!

घोर अंधेरा चारों ओर
दूर अभी तो लोहित भोर
थमा हुआ है
सारा शोर
ऐसे मौसम में
चुप क्यों हो,
कहो न कोई मन की बात!
भीगी-भीगी भारी रात

कुहरा बरस रहा चुपचाप
अतिशय उतरा नभ का ताप
व्योम-धरा का
मौन मिलाप
ऐसे लमहों में
पास रहो,
थर-थर काँपेगा हिम गात!
भीगी-भीगी भारी रात

नीरवता का मात्र प्रसार
तरुदल हिलते खेतों पार
जब-तब
बज उठते हैं द्वार
खोल गवाक्ष
न झाँको बाहर,
मादक पवन लगाए घात!
भीगी-भीगी भारी रात

24  दिसंबर 2007

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