अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में सोम ठाकुर की रचनाएँ—

गीतों में-
खिड़की पर आँख लगी
मन जंगल के हुए
प्रेमा नदी
सूर्यमुखी फूल
स्वर की तरंगें
वेला संवत्सरा
हवाएँ संदली हैं

संकलन में-
मेरा भारत- तिरंगा
         राष्ट्र देवता
         वंदन मेरे देश
मातृभाखा के प्रति- राजभाषा वंदन

 

सूर्यमुखी फूल

नीले इस ताल पर
झूल गया सूर्यमुखी फूल।
उलझी है एक याद
बरगद की डाल पर।

जन्मीं फसलें कितनी बार
कितने विषयों की यह चाँदनी निचुड़ गई।
वह नंगे पाँवों से अंकित पगडंडी
घने-घने झाड़ों से पुर गई

लहरों के लेख-चित्र
चुटकी भर झरे बौर
और क्या चढाऊँ
इस पूजा के थाल पर।

अब नहीं बाँधेंगे वे बाँहों के सेतु कभी
केशों के केतु नहीं फहरेंगे।
ध्वनियों में दौडते हुए वे रथ
पीपल की छाँह नहीं ठहरेंगे।

इस टूटी खामोशी में फिर से
रख दो यह
गरम-गरम फूल बुझे गाल पर
ठंडे इस भाल पर।

२१ मई २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter