अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में डॉ. तारादत्त निर्विरोध की रचनाएँ-

 

नए गीतों में-
एक अलग हाशिया
चितराम यादों के
शब्दों के पहरे
सुबह सुबह

गीतों में-
झरते हैं फूल-पात
थक गया हर शब्द
धूप की चिरैया
पानी का गीत
सुबह-सुबह

संकलन में-
ज्योतिपर्व- यादों के दीप
होली है- फागुन और बयार
 

 

सुबह सुबह

सुबह-सुबह को
भेंट गई शाम की चुभन,
उस किरन के नाम कोई
पत्र तो लिखो।

खुली जो आँख तो
लगा कि रूप सो गया,
साथ जो रहा था
आज वह भी खो गया।
देह-गंध यों मिली कि
दे गई अगन,
उस अगन के नाम कोई
पत्र तो लिखो।

मन किराएदार था
रच-बस गया कहीं,
तन किसी का सर्प जैसे
डंस गया कहीं।
हम मिले तो साथ में थी
सब कहीं थकन,
उस थकन के नाम कोई
पत्र तो लिखो।

मोड़ पर ही आयु के था
वक्त रुक गया,
दूर चल रहा था पांव
वह भी थक गया।
बांह में था याद की
सिमटा हुआ सपन,
उस सपन के नाम कोई
पत्र तो लिखो।

८ सितंबर २००८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter