मैं पत्थर की सड़क
पर
पत्थर-सा चला जा रहा था...
और तुम... एक आँख में ओस
एक आँख में आस लिए
आ कर मेरे घुटनों से लिपट गए
तुमने जब अपनी छोटी-सी गरदन
और बड़ी-बड़ी आँखों से
मेरे आर पार देखा
तो मुझे ऐसा लगा कि
मेरा ठंडा लहू
उबल कर निकल पड़ेगा
और ज़मीन पर गिर पड़ेगा
मुझमें तुमसे नज़र मिलाने की हिम्मत नही थी...
ना ही होगी कभी
मैंने तुम्हें कंधों से पकड़ा
और बिठा दिया फुटपाथ पर
जहाँ से तुम आए थे
और खुद खड़ा रहा सड़क पर
जो अब भी मेरे घुटनों से लिपटी हुई थी
तुम भीख नही माँग रहे थे
तुम बस पूछ रहे थे..
कि इतनी बड़ी इमारतें
इतनी सारी जेबें
मेरा नन्हा-सा पेट नहीं भर सकतीं
तुम फुटपाथ पर बैठे हँस रहे थे
और मैं घुटनों के बल बैठा रो रहा था
पर आँखों मे नमी नहीं थी..
मैं तुमसे भीख माँगता हूँ
इस मुफ़लिस को कुछ आँसू दे दो...