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मशाल

फिर से लौटी है मशाल
रौशनी का संकल्प लेकर
कोई चालीस साल बाद।

पिछली बार इस मशाल को,
इस संकल्प को
इस जज़्बे को लेकर दौड़े थे
कुछ महान खिलाड़ी
जिन्होंने ता–उम्र नाम कर दी थी
इक खेल के
सिर्फ इसलिए
कि नाज़ के साथ लिया जा सके
उनके देश का नाम भी
बेशुमार देशों की भीड़ में।

अपनी जिंदगी दे कर लाए थे
वो रौशनी इस धरती पर,
और मशाल उम्मीद की लौ जलाने के बाद,
गौरव के साथ
लौटी थी वहाँ
जहां कि पहले से नियत था

फिर से लौटी है मशाल
रौशनी का संकल्प लेकर
कोई चालीस साल बाद !

इस बार इस मशाल को
इस संकल्प को
इस जज़्बे को
इसी मशाल की रौशनी में जलाकर
दौड़े हैं कुछ सितारे
जिन्हें चमकने के लिए
शायद अब रौशनी चाहिए उधार की
जिसे ढूँढ रहे थे वो
इस मशाल की लौ में।

लौट गई मशाल तो इस बार भी
वहीं जहाँ कि पहले से नियत था
लेकिन अपने पीछे छोड़ गई
कई सुलगी हुई चिंगारियाँ
कई जलती हुई ज़िंदगियाँ
ज़िंदगियाँ जिन्होंने इक खेल को
अपना सब कुछ समर्पित कर दिया था
और ऐसा करना,
कोई खेल नहीं है शायद!!!

९ नवंबर २००३

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