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अनुभूति में रोली त्रिपाठी की रचनाएँ—

छंदमुक्त में-
राजनीतिज्ञ
समुद्र मंथन
 

 

राजनीतिज्ञ

माँ के मन में आई
बेटे का भविष्य जानने की आस
तो लेकर बेटे को
पहुँची ज्योतिषी के पास

माँ बोली महाराज
इसका हाथ देख भविष्य बताइए
पढ़ाई में मन लगाए इसे समझाइए

बेटे का हाथ देख ज्योतिष मुसकाया
फिर विस्तारपूर्वक माँ को बताया
पढ़ना लिखना तो मात्र संयोग है
इसके हाथ में तो
राजनीतिज्ञ बनने का योग है

आपका पुत्र घोटाले कर
बहुत धन कमाएगा
जिससे आपका सारा कष्ट
मिट जाएगा

महाराज आप कहते हैं कि
मेरा पुत्र घोटाले कर धन कमाएगा
क्या अपने हितों के लिए यह
इतना स्वार्थी हो जाएगा

देवी जी इसे स्वार्थ नहीं कहते हैं
फिर थोडे-बहुत दाँव पेंच तो
राजनीति में रहते हैं

मेरा पुत्र ठेला चलाएगा
लेकिन अपने देश का धन
नहीं चुराएगा

देवी जी आप बेकार में
हो रही हैं गरम
राजनीति में भ्रष्टाचार से
भला कैसी शरम

राजनीति में बहुत नाम करेगा
आपका बेटा
जो जितना करे घोटाला
उतना ही बड़ा नेता

महाराज लाल बहादुर भी तो
भारत माँ के लाल थे
परंतु देवी जी उस ज़माने में
नहीं इतने जंजाल थे
तब लोग थोड़े में ही
संतुष्ट रहते थे
हमने खाई नमक रोटी
शान से कहते थे

वर्तमान राजनीति की बात छोड़िए
यहाँ तो लोग चारा भी खा जाते हैं
और बड़े शान से यह बात
मीडिया को बताते हैं

महाराज क्या देशवासियों में
देशभक्ति गई है मर
अरे नहीं देवी जी
भावना तो है अमर

परंतु भावना पर हावी है स्वार्थ
हमें चाहिए ऐसा नेता
जो हो निश्छल और निस्वार्थ

महाराज अगर ऐसी बात है
तो मेरा बेटा राजनीतिज्ञ ही बनेगा
लेकिन वो भ्रष्टाचार में नहीं
ईमानदारी में देश का
नाम रोशन करेगा

९ फरवरी २००५

 

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