अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में संजय पुरोहित की रचनाएँ-

कोई तो है
भीगे अख़बार सा मैं
रे मानव
लो फिर आ गई कालिमा

 

लो, फिर आ गई कालिमा

फिर सुनाई देने लगा हैं,
गुंजन बिसरे पलों के झींगुरों का
फिर से लगा है दिखने,
टिमटिमाना यादों के जुगनुओं का
गुंफित फिर होने लगा हृदय
कहे-अकहे भावों से
स्मृतियाँ लेती अंगड़ाइयाँ फिर
हो रही तत्पर
लेने मुझे आगोश में
छोड़ आया था मैं जिन्हें
दूर, बहुत दूर
शून्य के बियाबान में,

सहसा मैंने पाया
स्वयं को मनुमंच पर
देखते ही देखते
पात्र आए खेलने
उभरा हुआ-सा मेरा अतीत
खेल रहा है आज से
आज की अठखेलियों पर,
मुसकुराता-सा कल
इस खेल का मैं अनाड़ी
रह गया निर्लिप्त केवल

२१ अप्रैल २००८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter