अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

मेरा भारत 
 विश्वजाल पर देश-भक्ति की कविताओं का संकलन 

 

कौन कह रहा

कौन कह रहा द्वापर में ही
कौरव कुल का
नाश हुआ

वही पिताश्री
बिन आँखों के माताश्री पट्टी बाँधे
ढो-ढो पुत्रमोह की थाती दुखते दोनों के काँधे
उधर न्याय की आस लगाये
अर्जुन सदा निराश हुआ

नकुल और
सहदेव सरीखे भाई के भी भाव गिरे
दुर्योधन जी राजमहल में दुस्साशन से रहें घिरे
जिसमें जितने दुर्गुण ज्यादा
वह राजा का ख़ास हुआ

चालें वही
शकुनि की दिखतीं चौपड़ के नकली पासे
नहीं मयस्सर चना-चबेना दूध-मलाई के झाँसे
चंडालों की मजलिस में जा
सदा युधिष्ठिर दास हुआ

भीष्म - द्रोण
सत्ता के साथी अपने-अपने कारण हैं
रक्षाकवच नीति के सबने किये बख़ूबी धारण हैं
सच कहने पर चचा विदुर को
दिखे आज वनवास हुआ

- ओमप्रकाश तिवारी
१२ अगस्त २०१३


इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter