अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

दीप धरो
वर्ष २०११ का दीपावली संकलन

देसी घर–संसार



 

बरसों पहले आई जब मैं
सात समंदर पार
गठरी बाँध के लाई थी संग
सारे तीज – त्यौहार

कभी मैं खोलूँ एक गाँठ मैं
द्वारे दीप सजाऊँ
इक खोलूँ मैं पुड़िया रंग की
मंगल कलश रंगाऊँ
बड़े जतन से जोड़ा मैंने
देसी घर – संसार

कभी मैं खोलूँ दूजी गठरी
ओढूँ लाल चुनरिया
झिलमिल बिंदिया माथे सोहे
पाँव सजे पायलिया

भेंट करें परदेसी नाते
रीझ – रीझ उपहार

कभी तो पागल मनवा ढूँढे
बचपन की वो गलियाँ
याद करूँ सखियाँ –हमजोली
भर - भर आवें अँखियाँ

आँचल में बाँधा है अब तक
माँ बाबुल का प्यार

-शशि पाधा

२४ अक्तूबर २०११

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter