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दीप धरो
वर्ष २०११ का दीपावली संकलन

नए अन्न की खुशबू



 

पूछो नहीं
कि क्या उत्सव का मौसम ले आया
गंगा जमुना की यादों का
संगम ले आया

मिला दशहरा
दीवाली की उजली साँसों से
धरती खुल कर बतियाती
अपने आकाशों से
कौंधा कोई छ्न्द,
ताल, स्वर, सरगम ले आया

नए अन्न की
खुशबू आई, जागी नई रसोई
नई बहू ने चाँद सरीखी
निर्मल रोटी पोई
नया नया सपना
सहेज कर बालम ले आया

किरन छुई
सूरज की गहरी नींद नदी की टूटी
लहर लहर में लगी चमकने
शुभ दिन सजी अँगूठी
भूला सा प्रसंग आखों में
शबनम ले आया

झालर पहने
हुई मुँडेरे माँग लगी फिर भरने
डेहरी डेहरी उजियारे की
चिड़िया लगी उतरने
एक हाशिया सघन सुखों का
कालम ले आया

काजल भरी
रात की आखों हँसने लगा सवेरा
फिर जहाज का पंछी लौटा
चहका रैन बसेरा
अपना "सांताक्रूज", "अमौसी",
"पालम" ले आया

- यश मालवीय

२४ अक्तूबर २०११

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