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शुभ दीपावली

अनुभूति पर दीपावली कविताओं की तीसरा संग्रह
पहला संग्रह
ज्योति पर्व
दूसरा संग्रह दिए जलाओ

दीपावली

पावन जलसा दीवाली का,
सब मिलकर के खूब मनाओ
धनदेवी गणपति को पूजो,
खीलें और बताशे खाओ।

कार्तिक मास अमावस आई,
कुछ-कुछ शीत साथ ले आई
मौसम है सुंदर सुखदाई,
कृषकों ने कुछ करी बुवाई
अन्नाभाव देश में भारी,
श्रम से पैदावार बढ़ाओ।

राजा राम हुए बनवासी,
संग सौमित्र सिया भी आई
कानन में निज कुटी बनाई,
दैत्यों से फिर हुई लड़ाई
उनका वध कर गृह को आए,
नागरिकों ने दीप जलाए
तब से यह आरंभ हुआ है,
राम-नाम का यश फैलाओ।

कुछ ही दिन पहले से करते,
निज-निज गृह की लोग सफ़ाई
कुछ करते चूना-कलई से,
कुछ मिट्टी से करें पुताई
प्रेम-भाव से मन निर्मल कर,
निज-निज कुटिया स्वच्छ बनाओ
बालक-वृद्ध सभी कहते हैं,
आओ मिलकर पर्व मनाओ।

दीवाली तो घर-घर होती,
लक्ष्मी-लंबोदर की पूजा
वे कहते हैं हमसे बढ़कर,
पुण्यवान ना कोई दूजा
दीप जलाते, मोद मनाते,
और पटाखे खूब चलाते
मधुर-मधुर पकवान बनाकर,
खुद खाओ औरों को खिलवाओ।

दीवाली के शुभ अवसर पर,
जुआ होता मदिरा छनती
और इसी से बात-बात पर,
झगड़ा होता, लाठी चलती
यदि ये कभी पकड़ भी जाते,
पीटे जाते, लूटे जाते
कैसा रोग भयंकर है यह,
फिर भी लोग नहीं शरमाते
मदिरा-पान छोड़कर मित्रों!
जुए पर तुम रोक लगाओ।

भ्रष्टाचार हर जगह फैला,
बहुत बढ़ रहे दस्यु-लुटेरे
बहु पीड़ित करते जनता को,
प्रतिक्षण रहते हैं वे घेरे
शासक जो शासन करता है,
वह है अति ही अत्याचारी
अतिशय भार बढ़ा अवनी पर,
धरा दुखित होती बेचारी
शेषनाग की शैया तज कर,
आओ शीघ्र खलों को मारो
गदा ठोककर चक्र चला कर,
शांति भरो सुजनों को तारो

पावन जलसा दीवाली का,
सब मिलकर के खूब मनाओ
धानदेवी गणपति को पूजो,
खीलें और बताशे खाओ।

-कंचन सिंह चौहान 'कंचन'
1 नवंबर 2006

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