अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

शुभ दीपावली

अनुभूति पर दीपावली कविताओं की तीसरा संग्रह
पहला संग्रह
ज्योति पर्व
दूसरा संग्रह दिए जलाओ

उजियार बहुत है

दूर उजालों की बस्ती है
पथ में भी अंधियार बहुत है।

नफ़रत नागफनी बन फैली
पग-पग हाहाकार बहुत है।
फिर भी ज़िन्दा है मानवता
क्योंकि जग में प्यार बहुत है।

अंधियारे से आगे देखो
सूरज है, उजियार बहुत है।
काँटों के जंगल से आगे
खुशबू भरी बयार बहुत है।

दीवारें मत खड़ी करो तुम
पहले से दीवार बहुत हैं।
नहीं गगन छू पाए तो क्या
मन का ही विस्तार बहुत है।

पूजा करना भूल गए तो
छोटा-सा उपकार बहुत है।

रामेश्वर दयाल कांबोज हिमांशु
२७ अक्तूबर २००८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter