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शुभ दीपावली

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दीपक

मूक जीवन के अँधेरे में, प्रखर अपलक
जल रहा है यह तुम्हारी आस का दीपक!
ज्योति में जिसके नई ही आज लाली है
स्नेह में डूबी हुई मानों दिवाली है!

दीखता कोमल सुगंधित फूल-सा नव-तन,
चूम जाता है जिसे आ बार-बार पवन!
याद-सा जलता रहे नूतन सबेरे तक
यह तुम्हारे प्यार के विश्वास का दीपक!

-महेंद्र भटनागर
1 नवंबर 2007

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।