अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में बल्ली सिंह चीमा की रचनाएँ-

अंजुमन में-
अब तो फिर
धूप से सर्दियों में

रोटी माँग रहे लोगों से
ले मशालें चल पड़े हैं
साज़िश में वो ख़ुद शामिल हो

 

अब तो फिर
 

अब तो फिर कहने लगी हैं राजनीतिक आँधियाँ
हर नगर सुन्दर बनाया है गिरा कर बस्तियाँ

आज शायद शहर में आया है कोई रहनुमा,
हर तरफ़ छाई हुई हैं वरदियाँ ही वरदियाँ

जब से गाँवों में इधर सूखा पड़ा है, दोस्तो !
क्यों उधर शहरों में जा कर बरसती हैं बदलियाँ

सच है रिश्वत के सिवा कुछ और वो खाता नहीं,
शाम ढलते ही पकड़ता है बराबर मछलियाँ

रोशनी करने की ख़ातिर जो जले थे एक दिन,
जल रहा है उन चराग़ों से अभी तक आशियाँ

आजकल है तू भी चुप औ’ मैं भी कुछ ख़ामोश हूँ,
किस तरह की दुश्मनी है तेरे मेरे दरमियाँ 

२४ सितंबर २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter