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अनुभूति में महेन्द्र हुमा की रचनाएँ-

अंजुमन में-
दुनिया से यार
बस्ती को आग
बाबा दादी
माँ ने रुई को घी बतलाकर

 

 

 

माँ ने रुई को घी बतलाकर

माँ ने रुई को घी बतलाकर बच्चे को बहलाया है
बच्चा खुश, पा माँकी आँखों में पानी भर आया है

माँ का दिल करता है क्रंदन, जब बच्चा ये कहता है
अम्मा देख खिलौने वाला नए खिलौने लाया है

गहन उदासी, घोर निराशा, पीड़ा औ अवसाद लिए
सदाचार तो ड्योढ़ी के बाहर ही रोता पाया है

कल मैंने इक बात जरा कड़वी सच्चाई से कह दी
आज प्रशासन ने ही मुझको दंगाई ठहराया है

आस बहुत थी मरते दम तक, पूत नहीं जब आया तो
बूढ़ा अपनी दोनों आँखें चौखट पर रख आया है

रूह के रिश्ते की गहराई इससे ज्यादा क्या होगी
जब भी चोट लगे बच्चे को, माँ कहकर चिल्लाया है

आओ ’हुमा‘ सोचें आजादी से अब तक के वर्षों में
नैतिकता के संदर्भों में क्या खोया, क्या पाया है!

२६ नवंबर २०१२

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