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अनुभूति में अनुपमा त्रिपाठी की रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
अनमोल पल
कोई खेतों सी
झरने लगी कविता
पलाश के प्रगाढ़ भावों में

शब्द शब्द मन पर छाया

 

अनमोल पल

अबके बसंत बरसा है फाग
पलाश के रंग में भीगी हूँ इस तरह
लगता है शब्दों के अंबार पर बैठी हूँ मैं
यहाँ सब कुछ मेरा है
रूप अरूप स्वरुप
सब कुछ
तुम्हारे शब्द भी मेरे हैं अब
तुम्हारे भाव भी मेरे हैं अब
मेरा अपना एकांत
और तुम से मिले मेरे अपने शब्द
किन्तु बोध मेरा अपना ही
और तुम से सजी
मेरी प्रिय आकृति
आकाश पर चलचित्र की भाँति
छाया सी उभरती
खिल जाता है मेरा एकांत

बरसाता है मुझ पर
मेरी ही पसंद के अनेक शब्द
पंखुड़ियों से
यूँ करता अठखेलियाँ
छुप छुप कर झाँकता है
कभी पहुँच जाता है मुझ तक
कभी फिर छुप जाता है
फिर कभी चुपके से आता है…
कुछ सपनो के कुछ भावों के
कुछ पलाश के अनमोल पल दे जाता है

१४ जुलाई २०१४

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