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अनुभूति में वीरेंद्र जैन की रचनाएँ -

नए गीत-
जाने कितने साल हो गए
देखने को
बनवासों का कोलाहल है
मौत मुझको दे दे मोहलत
ये ही दिन बाकी थे
लिप्साओं ने सारे घर को

गीतों में
अब निर्बंध हुआ

कोई कबीर अभी ज़िंदा है
चाँदी की जूती

अंजुमन में-
किताबें

छंदमुक्त में-
नया घर

हास्य व्यंग्य में-
आमचुनाव में
क्योंजी आप कहाँ चूके?
खूब विचार किए
नाम लिखा दाने दाने पर
बेपेंदी के लोटे
मुस्कान ये अच्छी नहीं
ये उत्सव के फूल
हम चुनाव में हार गए

 

खूब विचार किए

खूब विचार किए, क्या कहने! खूब विचार किए
रात दिवस सप्ताह महीने साल गुज़ार दिए
क्या कहने! खूब विचार किए

सभा, गोष्ठी, बहस, भाषणों की लग गया झड़ी
सब कुछ हुआ समस्या लेकिन अब भी वहीं खड़ी
जब बेमौत मर गए रोगी, तब उपचार किए
क्या कहने खूब विचार किए

कभी-कभी तो अधिवेशन में जूते लात चले
लेकिन फिर मौसेरे भाई हँस कर गले मिले
फिर उनके चमचों ने उनके जयजयकार किए
क्या कहने! खूब विचार किए

चोरी नहीं रुकी आँगन की चोर नहीं चौंके
ज़ंजीरों में बँधे-बँधे घर के कुत्ते भौंके
बाँट-बाँट कर घर को हरदम बंटाढार किए
क्या कहने! खूब विचार किए
क्या कहने! खूब विचार किए

16 मई 2007

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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