अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में अश्विनी कुमार विष्णु की रचनाएँ—

गीतों में-
चंदा मामा रहो न अब यों
चलना पथ पाना है

तटबन्धों-का टूटना
मन की पहरेदारी में

मेघ से कह दो

अंजुमन में-
टूटे-फूटे घर में
फ़ुर्सत मिले तो
बिना मौसम
शहर में

संकलन में-
नयनन में नंदलाल- प्रभुकुंज बिहारी
ममतामयी- जय अम्बिके
विजयपर्वी- आशाएँ फलने को विजयपर्व कहता चल
         पिंजरे का तोता
होली है- फागुन की पहली पगचाप

हरसिंगार- मन हरसिंगार

  मन-की पहरेदारी में

और भला क्या मिलता
मन-की पहरेदारी में

कुछ यादें अब तक शर्माई रहती हैं
फ़रियादें मुरझी कुम्हलाई रहती हैं
हैरत है अब भी इन भीगी आँखों में
उसी सावनी-की अँगड़ाई रहती है
और नया क्या मिलता
ग़म-की साझेदारी में

एक नींव पर मंज़िल ही मंज़िल धर दी
ग़लती तो हमने की हद पर हद कर दी
सब कुछ धूल मिलाने की घटना रच दी
जर्जर खम्भों ने भी मनमानी कर दी
और बुरा क्या मिलता
ऐसी कारगुज़ारी में

क्यूँ हम उलझे रहते हैं इतिहासों में
फ़र्क हुआ करते हैं युग-विश्वासों में
जीवन है प्रिय-साँसों में तन्मय होना
सुधा छलकती है प्रणयी संत्रासों में
और बता क्या मिलता
तन-की पीर-हज़ारी में !

२१ अक्तूबर २०१३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter