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अनुभूति में दिवाकर वर्मा की रचनाएँ-

नए गीतों में-
कलफ लगे खादी के कुरते
कहाँ गए दिन
गंगाराम
दिन
सूप खटकाती रही
 

गीतों में-
आदमी बौना हुआ है
चिठिया बाँच रहा चंदरमा
चेहरे से सिद्धार्थ
नदी नाव संजोग
नागफनियाँ मुस्कान में
पटरी से गाड़ी उतरी
फुनगी पर बैठा हीरामन
मैं वही साखी

राम जी मालिक
हुमकती पवन

 

दिन

सीढ़ियों पर
धूप से
चढ़ते-उतरते दिन।

नहीं हारे
हर घड़ी हर पल चले,
तार पर ज्यों
चल रहे हों सिलसिले,
और नट की
झूम से
गिरते-संभलते दिन।

दिन चढ़ा
ऐसे कि हो हल्दी चढ़ी,
शाम शरमीली
रचा मेहंदी खड़ी,
रूपसी के
रूप से
सजते-संवरते दिन।

अभी
क्षिति पर थे
अभी आकाष में,
साँप-सीढ़ी से
समय के पाष में,
आदमी के
भाग्य से
बनते-बिगड़ते दिन।

२२ अगस्त २०११

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