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अनुभूति में डा. रंजना गुप्ता की रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
नदी बहती है
बौने होते गीत
ये औरतें
वक्त की आहट

गीतों में-
पीर है ठहरी
राग बसंती
वे दिन
योजना असफल
हाट और बाजार

 

बौने होते गीत

शब्दों के कंजूस कहार
जब नहीं ढो पाते
संवेदना की पालकी
तब गीत ठूँठ हो जाते हैं
और कविता की जमीन बंजर
हो जाती है
मगर निरंकुश दर्द की उद्दाम
बिछलन को रोक कर
हमे एक बाँध बनाना ही होगा
वरना कतरा-कतरा बहती नदी रोक पायेगी
अपने अजन्मे शिशु के गर्भपात को
नदी का/ जंगल का होना
हमारे होने से भी ज्यादा जरूरी है
हमारी पीढ़ियों का जिक्र
तारीखों में तब्दील हो
उससे पहले
हमे अपनी संवेदना, अपना दर्द, अपना अंश
बचाना ही होगा
निपटना होगा
उन मनहूस दुराशाओं, दुरभिसंधियों से
जो हवा पानी, नदी, जंगल, जमीन और पहाड़
सबके खिलाफ लाम बन्द हो रही है 

१५ सितंबर २०१६

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